Monday, November 24, 2008

उल्टी व्याकरण


फिर कोई खिचड़ी पकाई जा रही है |
व्याकरण उल्टी पढ़ाई जा रही है |

कैद हैं सारे उजाले फाइलों में
वक्त पर तोहमत लगाई जा रही है |

पहले छपवा लो, सुनाना बाद में
मुल्क में कविता चुराई जा रही है |

हो उठे हैं सभ्य-गण सहसा रसिक
स्यात् निर्बल की लुगाई जा रही है |

सादगी देखें सियासत की हुज़ूर
सदन में गज़लें सुने जा रही हैं |


९-जून-१९८१

पोस्ट पसंद आई तो मित्र बनिए (क्लिक करें)

-----
(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी | प्रकाशित या प्रकाशनाधीन |
Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication.
http://joshikavi.blogspot.com

1 comment:

नारदमुनि said...

kya baat hai janab. narayan narayan