Thursday, October 30, 2008

इक पत्थर सा कुछ

खिड़कियाँ, दरवाज़े, छत कुछ भी नहीं |
यह हमारे घर सा कुछ रखा हुआ है |

आदमी से आदमी मिलता है पर
बीच में इक डर सा कुछ रखा हुआ है |

गीत बनने की प्रतीक्षा में युगों से
कंठ में इक स्वर सा कुछ रखा हुआ है |

शख्सियत का तो पता कुछ भी नहीं
द्वार पे नंबर सा कुछ रखा हुआ है |

हाँ में ही इसको हिलाना है अगर
देह पर क्यूँ सर सा कुछ रखा हुआ है |

बिजलियाँ कड़के, कभी सूरज तपे
सर पे इक अम्बर सा कुछ रखा हुआ है |

ज़िंदगी बीती है जिसको तोलते
दिल पे इक पत्थर सा कुछ रखा हुआ है |

९ फरवरी १९९५

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And here is an approximate translation -
Something like a stone:

windows, doors, roof - nothing is here |
here is something like my house |

people meet people but
there is a something like a fear in between |

waiting for eons to be a song
there is something like a voice/note in my throat |

no idea about the personality
there is something like a number on the door |

if it has to nod only in "yes"
why is there something like a head on my body?

lightening flashes or scorching sun
yet, there is something like a sky on my head |

weighing it, life has spent away
there is something like a stone on my chest|

(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी | प्रकाशित या प्रकाशनाधीन |
Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Joshi Kavi

5 comments:

Anonymous said...

ati uttam. sundar.

MANVINDER BHIMBER said...

खिड़कियाँ, दरवाज़े, छत कुछ भी नहीं |
यह हमारे घर सा कुछ रखा हुआ है |

आदमी से आदमी मिलता है पर
बीच में इक डर सा कुछ रखा हुआ है |
bahtreen....

हरि said...

भावपूर्ण कविता। बधाई।

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा, क्या बात है!

dr. ashok priyaranjan said...

देश के मौजूदा हालात को बहुत यथाथॆपरक ढंग से दशाॆया है आपने । किवता कई सवाल भी खडे करती है । मैने भी अपने ब्लाग पर एक किवता िलखी है । समय हो तो पढें और प्रितिकर्या भी दें-

http://www.ashokvichar.blogspot.com