Wednesday, October 15, 2008

कन्धों पर भारी है सर


दुहरी होने लगी कमर |
कन्धों पर भारी है सर |

राम-राम आदाब बंद हैं
धर्मों में बँट गया शहर |

शाम हुई घर जाना है
पर कैसा और किसका घर |

क्यूँ हर रात सताता है
रोज़ सुबह होने का डर |

मौसम क्या रुक पायेगा
जब तक होगी उन्हें ख़बर |

मंजिल का कुछ पता नहीं
सारा जीवन सिर्फ़ सफ़र |

विष पीकर जीती दुनिया
अमृत पीकर जाती मर |

दिल की राहें रोक खड़े
पत्थर के मस्ज़िद-मंदर |

१९-मई-१९९५

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And here is an approximate translation -
The head is heavy on the shoulders|

the back is getting doubly bent|
the head is heavy on the shoulders|

raam-raam and aadaab (salutations of hindus and muslims) are no more
the city is divided in religions |

it is evening and should go home
but what home? whose home?

why does it scare every night
the fear of the morning!

will the seasons (situations) remain still
till they get to know?

no idea of any destination
this whole life has been a journey!

they live drinking poison
and die drinking nectar!

as hurdles on the path of the hearts
stand the mosques and temples |

(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी | प्रकाशित या प्रकाशनाधीन |
Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Joshi Kavi

1 comment:

shashi said...

बहुत सुंदर| लोग सुबह का इंतज़ार करते हैं की रात खत्म हो, और यहाँ तो सुबह से ही डर लग रहा है| सच्चाई का सामना करना भी साहस की बात है|