Friday, February 13, 2009

सांभर वाली झील


एड़ी नीचे कील, फील गुड ।
दे पतंग को ढील, फील गुड ॥

तेरे खातिर रात पूष की
बड़ा ले गयी चील, फील गुड ।

राणाजी के ट्रस्ट खुल गए
धक्के खाएँ भील, फील गुड ।

दिखने में ज़्यादा दिखती पर
तौलें हलकी खील, फील गुड ।

राजनीति में कहाँ मधुरता
सांभर वाली झील, फील गुड ।

५ फ़रवरी २००४

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2 comments:

Udan Tashtari said...

बड़ा फील गुड हो रहा है रचना पढ़कर.

परमजीत बाली said...

बहुत बढिया!!अच्छी लगी रचना।