Tuesday, March 30, 2010

स्वामी और हम


दिल्ली और कर्नाटक में स्वामियों के कर्म उजागर- ५-३-२०१०

1. स्वामी और हम

स्वर्ण-महल रावण रहें, बन-बन भटकें राम ।
छः दशकों के राज का हासिल यह परिणाम ।
हासिल यह परिणाम , सेक्स में डूबे स्वामी ।
झूठ-मूठ ही हम गाते- 'मूरख, खल, कामी' ।
कह जोशी कविराय समेटें अपना ढाबा ।
अच्छा हो घर-बार बसा लें ऐसे बाबा ।


2.

ताम-झाम से जानिए धर्म-कर्म का मर्म ।
जितने ज्यादा ठाठ हैं उतने ही दुष्कर्म ।
उतने ही दुष्कर्म, कहाँ से रुपये आते ।
ना पूछे सरकार, न ही बाबा बतलाते ।
जोशी भोजन के बारे में बहुत पढ़ाए ।
मगर संतुलित भोजन टीचर ना कर पाए ।


3.

ए.सी. सारा आश्रम, हैं आयातित कार ।
भूल 'राम' भजते जहाँ बाबा 'पञ्च-मकार' ।
बाबा 'पञ्च-मकार' मद्य की बहती नदियाँ ।
मैथुन-मुद्रा युक्त सर्व करतीं सुन्दरियाँ ।
कह जोशी कविराय स्वर्ग जाकर क्या करना ।
जहाँ अप्सरा मिलें वहीं बाबा को रहना ।

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(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन ।
Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Joshi Kavi

सीमा-सुरक्षा


1. सीमा-सुरक्षा
(पिछले दो दशकों में चीन ने भारत की बहुत सी ज़मीन हथियाई- एक रिपोर्ट, ११-१-२०१०)

पंद्रह फुट का शेड है, छः फुट की दूकान ।
तिस पर सड़कों पर रखा लाला का सामान ।
लाला का सामान, जहाँ पर भी ये जाएँ ।
धड़ से चार गुनी अपनी टाँगें फैलाएँ ।
जोशी चीनी सीमा पर यदि इन्हें बसा दें ।
तो ये ल्हासा तक अपनी दूकान लगा दें ।


2. ग्लोबल वार्मिंग
(उत्तर भारत में कड़ाके की ठण्ड-१२-१-२०१०)

वे ग्लोबल वार्मिंग कहें, हमें लग रही ठण्ड ।
यह वैज्ञानिक तथ्य है या कोई पाखंड ।
या कोई पाखंड, फेक्ट्री नहीं लगाएँ ।
ठीक पुरानी करने की तकनीक ले जाएँ ।
जोशी तो फिर कैसे अपना काम चलेगा ।
फ़िक्र नहीं, सब योरप-अमरीका भेजेगा ।


3. चिक-चिक करके
(महँगाई पर सोनिया चिंतित- २१-१-२०१०)

काम करो ना करो पर करो काम की फ़िक्र ।
फ़िक्र करो ना करो पर करो फ़िक्र का ज़िक्र ।
करो फ़िक्र का ज़िक्र, बढ़े जनता की हिम्मत ।
औ' लग जाए आस, घटेगी अब तो कीमत ।
जोशी सहते-सहते जनता सह जाएगी ।
थोड़े दिन चिक-चिक करके फिर रह जाएगी ।


4. राम की सीमा
(इंदौर में तम्बुओं में भाजपा का अधिवेशन- १८-२-२०१०)

मंदिर तक सीमित हुए पुरुषोत्तम श्री राम ।
आदर्शों के राम से नहीं किसी को काम ।
नहीं किसी को काम, यहाँ तम्बू थे ए.सी. ।
ऐसे करते महँगाई की ऐसी-तैसी ।
कह जोशी कविराय हमारी हालत पतली ।
आप खा रहे अधिवेशन में भुट्टा-इमली ।

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