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Wednesday, December 30, 2009

आपके बाप का है वतन, सेठजी


2009-12-13 


आपके बाप का है वतन, सेठजी ।
लूटो जितना तुम्हारा हो मन, सेठजी ।

लोग भूखे रहें, कोई मुद्दा नहीं
कर ही लेंगे ये सब कुछ सहन, सेठजी ।

कोई मूरत लगे या बने मकबरा
खर्च हम को ही करना वहन, सेठजी ।

घास हमको न डाले कोई पंच भी
आपके साथ सारा सदन, सेठजी ।

हमको दो गज़ ज़मीं भी नहीं मिल सकी
आपके पास धरती-गगन, सेठजी ।

ठाठ ही ठाठ हैं, आप करते हैं क्या
प्रश्न ये ही है सबसे गहन, सेठजी ।

१३-१२-२००९
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Sunday, May 10, 2009

मेरा डर


उनका प्यार तसव्वुर निकला ।
कितना सच मेरा डर निकला ॥

किया जहाँ भी रैन बसेरा ।
बटमारों का ही घर निकला ॥

सबको साया देने वाला ।
आँचल आँसू से तर निकला ॥

सभी संगसारों की ज़द में
केवल मेरा ही सर निकला ॥

उनका ख़त बिन पढ़ा रह गया
सारा तंत्र निरक्षर निकला ॥

जीवन भर परबत खोदा पर
जब निकला चूहा भर निकला ॥

२३ मार्च २००५

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[ इतने दिनों तक पोस्ट न कर पाने के लिए मैं आप सबका क्षमार्थी हूँ, पिताजी ने एक बार कंप्यूटर जो सीखा, अब टाइप कर कर कतार लम्बी कर दी है, मैं ही पीछे रह गया हूँ पोस्ट कराने में - शशिकांत जोशी ]


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Monday, April 13, 2009

लोकतंत्र का सर्कस - जय हो


डेमोक्रेसी वाले नीले आसमानों के तले
नेता और लाला जी बस दो ही तो फले ।
जय हो ।

सावन में बाढ़ आए या पड़े सूखा
हर हालत जनसेवक तो कमाई करे ।
जय हो ।

फूट डालें जात, धर्म, प्रान्त के लिए
राष्ट्रीय एकता की बातें पर करें ।
जय हो ।

हमला हो, बाढ़, सूखा, बेकारी बढ़े
नेता सब बचे रहें, जनता पर मरे ।
जय हो ।

बूढ़े हो गए है पर मन न भरा
चुनावों में अब बेटे, पोते हैं खड़े ।
जय हो ।

एक दूसरे को सब चोर कह रहे
ये ही मौसेरे भाई फिर गठबंधन करें ।
जय हो ।

९ मार्च २००९
(बतर्ज़ - 'जय हो' - फ़िल्म स्लमडोग मिलिनिएर )

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Sunday, April 12, 2009

लोकतंत्र का सर्कस - भोजन का अधिकार


(१) मुहब्बत जिंदाबाद
(मटुकनाथ ने 'भारतीय मुहब्बत पार्टी' बनायी)

अगर मुहब्बत पार्टी सत्ता में आ जाय ।
प्रेमी जन को कोई भी सके न आँख दिखाय ॥
सके न आँख दिखाय, प्रेम में टाँग अड़ाए ।
पुलिस पकड़ ले जाय, जेल की रोटी खाए ॥
जोशी संसद में न समय बर्बाद करेंगें ।
'बुद्ध-जयन्ती पार्क ' सभी आबाद करेंगें ॥
(बुद्ध-जयन्ती पार्क दिल्ली का एक कुख्यात मिलन स्थल है ।)

(२) भोजन का अधिकार
( कांग्रेस का चुनाव घोषणा पत्र)

कांग्रेस घोषित करे 'गर फिर आयी सरकार ।
तो जनता को मिलेगा भोजन का अधिकार ॥
भोजन का अधिकार, जहाँ जी चाहे जाओ ।
मनपसंद होटल में जी भर खाना खाओ ॥
जोशी होटल मालिक बोले-पैसे धर दे ।
कहना-मनमोहन के खाते क्रेडिट कर दे ॥

२४ मार्च २००९

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नैनो कार - घर की शोभा


रोटी, पानी, नौकरी ना कुछ भी दरकार ।
लो बाज़ार में आ गई सबसे सस्ती कार ॥
सबसे सस्ती कर, नाम है इसका 'नैनो' ।
तुरत कराओ बुकिंग भाइयो, प्यारी बहनो ॥
कह जोशी कविराय सड़क पर जगह न मिलती ।
खड़ी रहे घर पर तो भी शोभा बढ़ती ॥

२४ मार्च २००९

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लोकतंत्र का सर्कस - पेट सभी का पापी

(१) पापी पेट

होंगें कहीं विदेश में आइ.पी.एल के मैच ।
वे मारे छक्के वहाँ, यहाँ करें हम कैच ॥
यहाँ करें हम कैच, मची है आपाधापी ।
बन्दर और मदारी पेट सभी का पापी ॥
जोशी कहते लोग-क्रिकेट की साख डुबो दी ।
'पहले धंधा, देश बाद में ' कहते मोदी ॥

(२) धर्म रक्षा के लिए

वे क्रिकेट को मानते हैं भारत का धर्म ।
मैच यहाँ न हुए तो डूब मरें कर शर्म ॥
डूब मरें कर्र शर्म, धर्म के रक्षक सारे ।
क्रिकेट धर्म को लेकर चिंतित है बेचारे ॥
कह जोशी कविराय यहाँ जो ना बच पाये ।
तो ये मज़मा धर्म का अफ़्रीका ले जाएँ ॥

२४ मार्च २००९

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लोकतंत्र का सर्कस - लोकतंत्र की हो रही सोलह दूनी आठ


(१) एक नूर से

इक दूजे की उलटते सभी यहाँ पर खाट ।
लोकतंत्र की हो रही सोलह दूनी आठ ॥
सोलह दूनी आठ, न अल्ला, राघव, माधव ।
ब्रह्मण, बनिया, जात, दलित, मुस्लिम या यादव ॥
कह जोशी कविराय बने सब एक नूर से ।
ऐसी बातें केवल मुँह से, दूर-दूर से ॥

(२) इलाहबाद में परीक्षा में नक़ल न करवाने देने पर सिपाही का नाक काट खाया ।

हमें बताएँ पुलिस की अब रही कहाँ पर धाक ।
नक़ल कराने दी नहीं काट भग गया नाक ॥
काट भग गया नाक, धाक सब ख़ाक हो गयी ।
लेकिन इससे एक बात तो साफ़ हो गई ॥
जोशी ऐसी जगह सिर्फ़ नकटे भिजवायें ।
चले काम सब ठीक सभी से मिलकर खाएँ ॥

२४ मार्च २००९

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लोकतंत्र का सर्कस - ३ सोता आधे पेट पर गंगू तेली रोज

(परसादी लाल मीणा ने पोते के मुंडन पर २०-२५ हज़ार लोगों को भोज में बुलाया)

राजनीति में चल रहे तरह-तरह के भोज ।
सोता आधे पेट पर गंगू तेली रोज ॥
गंगू तेली रोज, अगर आटा मिल जाए ।
तो है महँगी दाल कहाँ से जुगत भिड़ाए ॥
कह जोशी कविराय इ कैसी उलझन लादी ।
देना होगा वोट अगर खाली परसादी ॥

(२)
गीता-पाठ
(प्रियंका ने वरुण को गीता पढ़ने की सलाह दी )

असर यहाँ करता नहीं गीता का उपदेश ।
लेकिन उससे बड़ा है पार्टी का आदेश ॥
पार्टी का आदेश, अगर वि.हि.प. जारी कर दे ।
तो कुलदीपक बापू को भी थप्पड़ धर दे ॥
कह जोशी कविराय क्या हुआ गीता पढ़कर ।
भाई-भाई मरे महाभारत में लड़कर ॥

२४ मार्च २००८

(किसी कारणवश ये रचनाएं पहले पोस्ट नहीं हो पाईं , आशा है विषय की शाश्वत रोचकता के कारण अभी भी आनंद देंगी ।)

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Saturday, April 11, 2009

लोकतंत्र का सर्कस - २

(१)
वे जो करें बिहार में झारखण्ड में आप ।
राजनीति में भोगते सभी यही संताप ॥
सभी यही संताप, राज के खेल निराले ।
यहाँ नहीं होते कोई भी भोले-भाले ॥
कह जोशीकविराय उन्हें बस कुर्सी दीखे
वो हैं लोमड़-बाघ, और हम भेड़ सरीखे ॥

(२)
कांग्रेस में मची है अद्भुत रेलमपेल ।
पासवान को ले भगी लालूजी की रेल ॥
लालूजी की रेल, निभेगी कब तक यारी ।
मतलब की मनुहार अंत में पड़ती भारी ॥
कह जोशीकविराय काम होगा सस्ते में ।
बता बेटिकट कहीं उतारेंगें रस्ते में ॥

(३)
लालूजी के आपस है गाड़ी भरकर घास ।
उसको उतनी डालते जिससे जितनी आस ॥
जिससे जितनी आस, सोनिया को कल डाली ।
पासवान के लिए वही तरकीब निकाली ॥
जोशी रामविलास नहीं उनसे कुछ कम हैं ।
पासवान को बना सके किसमें वह दम है ॥

(४)
जो कुछ संप्रग ने किया अमरसिंह के साथ ।
उसको वो ही मिल रहा है लालू के हाथ ॥
है लालू के हाथ नीति यह कहती आई ।
सबको अपने कर्मों का फल मिलाता भाई ॥
कह जोशीकविराय काठ की है 'गर हंडिया ।
बस चढ़ती इक बार भले हो कितनी बढ़िया ॥

(५)
अनुभव उल्टे हो रहे मान भले न मान ।
लोकतंत्र में बड़ा है हंडिया का स्थान ॥
हंडिया का स्थान, आग पर चढ़ती रहती ।
इस-उस चूल्हे चढ़े मगर ख़ुद कभी न जलती ॥
जोशी भोली जनता झूठी आस लगाये ।
खिचड़ी पकती मगर उसे नेता खा जाएँ ॥

(६)
धनबल-भुजबल के बिना किसको मिलते वोट ।
तो यदि बाँटे वरुण ने तो इसमें क्या खोट ॥
तो इसमें क्या खोट, यही सरकारें करतीं ।
वोट बैंक के खातिर बिजली फ्री में देती ॥
जोशी टीवी बाँटें, दें सस्ते में चावल ।
तब आचार संहिता क्यूँ न होती घायल ॥

(७)
मन मोहन, मायावती, अडवाणी औ पवार ।
लालू के कंधे चढ़े पासवान तैयार ॥
पासवान तैयार, सभी को कुर्सी दिखती ।
गौडा और मुलायम को भी लार टपकती ॥
कह जोशी कविराय भाड़ में जाए सेवा ।
मची हुई है लूट सभी को भावे मेवा ॥

(८)
नीति और साहित्य का कैसा बंटाधार ।
अब कविता में आगये लालू और पवार ॥
लालू और पवार, मुलायम और पासवान जी ।
राम, कृष्ण, गाँधी पर जाता नहीं ध्यान जी ॥
कह जोशीकविराय विकट माया की माया ।
कविता में आदर्शों का हो गया सफाया ॥

(९)
वृक्ष कभी न फल चखें, नदी न पीती नीर ।
परमारथ के वास्ते, साधू धरें शरीर ॥
साधू धरें शरीर, सार को गह लेते हैं ।
पार्टी तो तिनका भूसा सब तज देते हैं ॥
कह जोशी कवि टिकट नहीं देता 'गर पटना ।
चल दिल्ली दरबार सत्य हो जाए सपना ॥

(१०)
चोर अन्य दल में अगर तो है पक्का चोर ।
पल में साधू हो अगर आए अपनी ओर ॥
आए अपनी ओर, विरोधी को तज करके ।
तो लो उसका हाथ थाम आगे बढ़ करके ॥
जोशी साधू औ' शैतान सभी आ जाएँ ।
किसी तरह सत्ता- वैतरणी पार लगायें ॥

२२ मार्च २००९


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Thursday, March 19, 2009

लोकतंत्र का सर्कस - १


(१)
अपना मानेंगें किसे, किसका हो विश्वास ।
छोड़ सोनिया को भगे, लालू, रामविलास ॥
लालू रामविलास, जिधर जब घास दिखेगी ।
मौसेरे भाइयों की जोड़ी वहीं मिलेगी ॥
कह जोशी कविराय लोग, दल आते-जाते ।
नहीं किसी का कोई सब मतलब के नाते ॥

(२)
वरुण फँस गए झाड़कर भड़काऊ स्पीच ।
जिसको भी मौका मिले टाँग रहा है खीच ॥
टाँग रहा है खींच, फूल किस मुख से झरते ।
सब अपनी-अपनी शैली में गाली बकते ।
जोशी निर्वाचन आयोगी चुप क्यों रहते ।
तिलक, तराजू के ऊपर जब जूते पड़ते ।

(३)
लोकतंत्र में आगये कैसे दिन भगवान ।
नैया पार लगायेंगें काका और रहमान ॥
काका और रहमान, पढ़ें कविता औ' गायें ।
ये उनकी पैरोडी पर चीखें-चिल्लाएँ ॥
कह जोशी कविराय जो मन से सेवा करता ।
उसे लोक कुर्सी पर क्या दिल में भी रखता ॥

(४)
लोकतंत्र की सज रही है अद्भुत बारात ।
कुर्सी दुल्हन एक है लेकिन दूल्हे सात ॥
लेकिन दूल्हे सात, अजब है गड़बड़ झाला ।
असमंजस में है दुल्हन किसको डाले माला ॥
कह जोशी कविराय यही इतिहास बताये ।
हर द्रुपदा के पाँच-पाँच पति होते आए ॥

१९ मार्च २००९

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Tuesday, March 17, 2009

सुख-सागर

सुखराम जी को सज़ा सुनादी गई है । उनके घोटाला उद्घाटन-काल की कुछ कुण्डलियाँ पुनरावलोकन के लिए प्रस्तुत हैं ।

सुखराम के घर सी.बी.आई. के छापे; तीन करोड़ नक़द मिले, एक समाचार-१६-८-९६

लन्दन में सुखराम जी करवा रहे इलाज़ ।
घर में घुस कर खोलती सी.बी.आई. राज़ ॥
सी.बी.आई. राज,आ गया कलजुग भारी ।
जनसेवक को बता रहे हैं भ्रष्टाचारी ॥
कह जोशी कविराय नहीं कुछ काला धंधा ।
कहो कौन करता जग में सेवा, बिन चन्दा ॥

सौ करोड़ के देश में केवल चार करोड़ ।
रखने पर सुखराम के बाजू रहे मरोड़

बाजू रहे मरोड़, होड़ सी लगी हुई है ।
धन-संग्रह की तृष्णा सब में जगी हुई है

कह जोशी कविराय तलाशी करवाएंगें ।
छुट भैयों के घर में इतने मिल जायेंगें


बिन मेहनत के ही अगर घर में आयें दाम ।
सारे 'सुख' हों भले ही मगर नहीं हैं 'राम'

मगर नहीं हैं 'राम', धर्म औ कर्म छोड़कर ।
सिर्फ़ भोग का आराधन चल रहा निरंतर

कह जोशी कविराय मुक्त हैं काले धंधे ।
पीछे छूटा देश बढ़े आगे कुछ बन्दे




सुखराम अस्पताल में अपना समय बिताने और ईश्वर में ध्यान लगाने के लिए माला जपेंगे - १७-९-९६

जब तक रिश्वत खा रहे, भोग रहे आराम ।
तब तक क्षणभर के लिए याद न आए राम

याद न आए राम, लगी जब सी.बी.आई. ।
राम-नाम की माला जपने की सुध आई

कह जोशी कविराय सिर्फ़ दुःख में जो भजते ।
ऐसों की फरियाद रामजी कभी न सुनते


मुझे बदनाम कराने के लिए चोरी-छिपे रकम मेरे घर में रखी गई -सुखराम, ८-१०-९६

कोई रुपये रख गया करने को बदनाम ।
लेकिन सच्चे संत हैं पंडित श्री सुखराम

पंडित श्री सुखराम, ज़रा भी ना ललचायें ।
पर-धन धूरि समान, हाथ तक नहीं लगाएँ

कह जोशी कविराय विप्र सीधे, संतोषी ।
जनता ही है दुष्ट बताती उनको दोषी


खुला निमंत्रण आपको अपना रहा ज़नाब ।
बड़े शौक से कीजिए छवि को मेरी ख़राब

छवि को मेरी ख़राब, नोट जितने जी चाहें ।
खुला पड़ा है गेट आप आकर रख जाएँ

कह जोशी कविराय करो माया पर काबू ।
ख़ुद ही सुख और राम चले आयेंगे बाबू




जेल में सुखराम को डेंगू का डर सता रहा है -१२-१०-९६

नेताओं ने कर दिए खाली कई मकान ।
कूलर खाली न करे मच्छर बेईमान

मच्छर बेईमान, कोठरी में मंडराए ।
पंडित जी की पूजा में बाधा पहुँचाये

कह जोशी कविराय नोट जिसने रखवाए ।
'एडिस' मच्छर भेज आपको वही डराए



ताज़ा हाल

सुख-सागर से डर गए रहे किनारे बैठ ।
कैसे पायेंगे भला सच को गहरे पैठ

सच को गहरे पैठ, यहाँ की जनता भोली ।
दो दिन पढ़ अख़बार सोचती मारो गोली

कह जोशी कविराय हमारा कहा मानिए ।
बैक डेट से उलट-पलटकर हाल जानिए



अब तो अस्सी पार हैं तन-मन से असमर्थ ।
ऐसे में इस सज़ा का बोलो क्या है अर्थ

बोलो क्या है अर्थ, जेल यदि भेजें जाएँ ।
इसकी क्या गारंटी सज़ा पूरी कर पायें

कह जोशी कविराय सज़ा यदि देना चाहो ।
ब्याज सहित सारे पैसे वापिस मंगवाओ


२६ फरवरी २००९

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लाला का डी.ए.


(छः प्रतिशत डी.ए. की घोषणा)

छः प्रतिशत डी.ए.बढ़ा, धन्यवाद श्रीमान ।
दस प्रतिशत दुर्लभ हुई, राशन की दूकान ।
राशन की दूकान, वस्तुएं आगे-आगे ।
पीछे-पीछे हम औ' डी.ए.भागे-भागे ।
जोशी हमें बनाना उल्लू छोड़ दीजिये ।
डी.ए. लाला के खाते में जोड़ दीजिये ।

२७-२-२००९

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Monday, February 9, 2009

ख़ुद ही रस्ता भूल गए हैं


मेरा साथ निभाने वाले ।
निकले दिल बहलाने वाले ॥

पहले अपनी जान बचालें
मेरी जान बचाने वाले ।

थोड़े दिन ही जम पाते हैं
केवल रंग जमाने वाले ।

अन्दर से कमजोर बहुत हैं
ऊँचे घर तहखाने वाले ।

ख़ुद ही रस्ता भूल गए हैं
मुझको राह दिखाने वाले ।

पहले ख़ुद से आँख मिलालें
मुझसे आँख मिलाने वाले ।

२३ सितम्बर २००४

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Thursday, February 5, 2009

तुमसे बात करनी थी


दर्द होता वो या दवा होता ।
कुछ न कुछ तो मगर हुआ होता ।

पर्दादारी भी इतनी क्या कीजे
कम कम ख़ुद से तो कहा होता ।

किसी के साथ हँसते रो लेते
आदमीयत का हक अदा होता ।

सुबह तक तुमसे बात करनी थी
तू अगर शाम को मिला होता ।

ये कठिन रास्ते सहल होते
करके हिम्मत जो चल पड़ा होता ।

दिल तो पत्थर में भी धड़कता है
तूने 'गर प्यार से छुआ होता ।

३१ जुलाई २००२

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Friday, January 16, 2009

आप सो रहे हैं टाँग पसारे


सूरज चन्दा सारे तारे ।
धरती और आकाश तुम्हारे ॥

सारा चारा आप चर गए
लोग अभी तक हैं बेचारे ।

ओठों से कुछ और बोलते
आँख करे कुछ और इशारे ।

एक टाँग पर मुल्क खड़ा है
आप सो रहे हैं टाँग पसारे ।

बाट जोतते उजियारे की
अब भी बस्ती गाँव दुआरे ।

४ सितम्बर १९९७

-- ११ साल पहले लिखी यह ग़ज़ल आज भी उतनी ही शाश्वत प्रतीत होती है, कि समझ नहीं आता अपनी नज़र की दाद दूँ या देश के दुर्भाग्य पर शोक ।

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Wednesday, January 14, 2009

डायरी


करती नींद हराम डायरी ।
कैसी है हे राम! डायरी ॥

करते जो हालात कराता
कुछ ना आए काम डायरी ॥

वह लिखने में कब आता है
जो देती अंजाम डायरी ॥

नहीं दीखती जिनको मंजिल
उनके लिए मुकाम डायरी ॥

ज्यादातर को गुठली भर है
कुछ के खातिर आम डायरी ॥

राजा भोज साफ़ बच जाते
गंगू को इल्ज़ाम डायरी ॥

दुनिया की डायरियाँ झूठी
सच जो लिक्खें राम डायरी ॥

२८ अगस्त १९९८

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Tuesday, January 13, 2009

महलों में दीवाली देख

देख झरोखे,जाली देख ।
महलों में दीवाली देख ॥

राजा रखवालों में छुप कर
करे तेरी रखवाली देख ।

क्यों ओठों पर जीभ फिराता
उनके रुख की लाली देख ।

अपनी भूख भूल टी.वी. में
सजी सजाई थाली देख ।

तेरी चाँद भले हो गंजी
उनकी जुल्फें काली देख ।

पहुँच गया सब माल विदेशों
अपनी जेबें खाली देख ।

अपने मुँह मिट्ठू बनते वो
लोग बजाते ताली देख ।

'तंत्र' मसीहा बन कर बैठा
सारा 'लोक' सवाली देख ।

भले जनों को भाषण झाड़ें
लम्पट धूर्त मवाली देख ।

छोड़ देखना फिल्मी 'फायर' *
जा अपनी घरवाली देख ।

(* दीपा मेहता की फ़िल्म फायर का सन्दर्भ )

१५ दिसम्बर १९९८

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Sunday, January 11, 2009

हम तो


1999-01-01 



हम क्या करते 'गर कमरों में कुरसी ठिठुरे ।
रगड़ हथेली गरमी पैदा करते हम तो ॥

उनके महलों के दीपक की गरमी लेकर
खड़े रात भर जमुना जल में रहते हम तो ।

फिक्रमंद हैं आप हमारे लिए सुना है
इसी भरोसे हर मौसम को सहते हम तो ।

आप चेतनायुक्त, आपकी वाणी में बल
गूँगे मक्खी-मच्छर हैं क्या करते हम तो ।

आप तैर सकते उलटी धाराओं में भी
इक लावारिस लाश धार संग बहते हम तो ।

पेड़ जलें गरमी में जैसे, सरदी में भी
हम भी वैसे बाड़मेर हैं दहते हम तो । *

(* राजस्थान के बाड़मेर जिले में गरमी और सर्दी दोनों अधिक पड़ते हैं)

१ जनवरी १९९९

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Saturday, January 10, 2009

शब्द और आचरण


भावना बिन क्या धरा है व्याकरण में ।
शब्द का अनुवाद तो हो आचरण में ॥

हैं सुरक्षित चंद घर औ ' लोग माना
घूमता आतंक पर वातावरण में ।

स्वयं की रक्षा सभी मिलकर करें अब
'तंत्र' तो है लिप्त अपराधीकरण में ।

छोड़िए सद्भावना संदेश देना
होइए शामिल कभी जीवन मरण में ।

और भी हैं धर्म मानव देह के पर
दे रहें हैं ध्यान सब बाजीकरण में ।

रत्न आभूषण बहुत पहने हुए हैं
पर कहाँ हैं सत्य-करुणा आभरण में ।

२८ जनवरी १९९९

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Monday, January 5, 2009

ईद और मुहर्रम



उनसे सारी उमर ठनी ।
मगर न कोई बात बनी ।

घर-आँगन चंदन महके
मन में फूले नागफनी ।

गीली दीवारें मिट्टी की
सर पर काली घटा तनी ।

जो जितने अनजाने थे
उनमें उतनी अधिक छनी ।

झोंपडियों पर लिखा मुहर्रम
बड़े घरों में ईद मनी ।

१७ दिसम्बर १९९८

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