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Monday, April 13, 2009
लोकतंत्र का सर्कस - जय हो
डेमोक्रेसी वाले नीले आसमानों के तले
नेता और लाला जी बस दो ही तो फले ।
जय हो ।
सावन में बाढ़ आए या पड़े सूखा
हर हालत जनसेवक तो कमाई करे ।
जय हो ।
फूट डालें जात, धर्म, प्रान्त के लिए
राष्ट्रीय एकता की बातें पर करें ।
जय हो ।
हमला हो, बाढ़, सूखा, बेकारी बढ़े
नेता सब बचे रहें, जनता पर मरे ।
जय हो ।
बूढ़े हो गए है पर मन न भरा
चुनावों में अब बेटे, पोते हैं खड़े ।
जय हो ।
एक दूसरे को सब चोर कह रहे
ये ही मौसेरे भाई फिर गठबंधन करें ।
जय हो ।
९ मार्च २००९
(बतर्ज़ - 'जय हो' - फ़िल्म स्लमडोग मिलिनिएर )
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(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन ।
Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Joshi Kavi
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लोक तंत्र का सर्कस,
व्यंग्य
Saturday, November 22, 2008
बाबू
1975-12-08
ख़त लिख दे साँवरिया के नाम बाबू |
वो कहते थे कर देंगे काम बाबू |
कोई भी शासन हो 'लाला' फलेंगे
इनका पक्का है सब इंतज़ाम बाबू |
जो राजा थे, राजा हैं, राजा रहेंगे
और अपने को रहना अवाम बाबू |
हमको तो नियमों में बाँधोगे लेकिन
कौन नेता को डाले लगाम बाबू |
वे महलों में रहकर भी मौसम से डरते
नींद अपनी क्यों जाने हराम बाबू |
कहते हैं 'जनता' अब दिल्ली में रहती
मुझे तू ही बता मेरा नम बाबू |
८-दिसम्बर-१९७५
बतर्ज़ - ख़त लिख दे सांवरिया के नाम बाबू - फ़िल्म आए दिन बहार के, आशा भोंसले
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(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी | प्रकाशित या प्रकाशनाधीन |
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http://joshikavi.blogspot.com
वो कहते थे कर देंगे काम बाबू |
कोई भी शासन हो 'लाला' फलेंगे
इनका पक्का है सब इंतज़ाम बाबू |
जो राजा थे, राजा हैं, राजा रहेंगे
और अपने को रहना अवाम बाबू |
हमको तो नियमों में बाँधोगे लेकिन
कौन नेता को डाले लगाम बाबू |
वे महलों में रहकर भी मौसम से डरते
नींद अपनी क्यों जाने हराम बाबू |
कहते हैं 'जनता' अब दिल्ली में रहती
मुझे तू ही बता मेरा नम बाबू |
८-दिसम्बर-१९७५
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पुस्तक - बेगाने मौसम
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