Saturday, November 14, 2009
दस्ताने
जब दस्तानों से ही हाथ मिलाना है ।
तो फिर क्यों चलकर उनके घर जाना है ॥
अपनी आँखे बिछी रहेंगी रस्ते पर
वे अपनी जानें- आना, ना आना है ॥
कहीं पियो मन्दिर, मस्जिद, मैखाने में
नशा एक है जुदा-जुदा पैमाना है ॥
हमको सबका नशा अधूरा लगता है
सबने, सबको अलग-अलग पहचाना है ॥
चार धाम औ' हज़ सब कर आए लेकिन
जो घर में बैठा है वह अनजाना है ॥
३१-१०-२००९
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(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन ।
Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Joshi Kavi
Saturday, May 16, 2009
मुल्क फँसा है मझधारों में
2006-01-27
गद्दी पर असवार* हो गए ।
जनता से सरकार हो गए ॥
'सोने की चिड़िया' पर उनके
सब के सब अधिकार हो गए ॥
पहले तो बेकार घूमते
लेकिन अब बाकार** हो गए ॥
कर्ज़दार है मुल्क भले ही
वे सरमायादार हो गए ॥
देश अंधेरे में पर उनके
सब सपने साकार हो गए ॥
पार नहीं पड़ रही 'लोक' की
पर वे अपरम्पार हो गए ॥
मुल्क फँसा है मझधारों में
उनके बेड़े पार हो गए ॥
२७ जनवरी २००६
* सवार ** कार सहित
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जनता से सरकार हो गए ॥
'सोने की चिड़िया' पर उनके
सब के सब अधिकार हो गए ॥
पहले तो बेकार घूमते
लेकिन अब बाकार** हो गए ॥
कर्ज़दार है मुल्क भले ही
वे सरमायादार हो गए ॥
देश अंधेरे में पर उनके
सब सपने साकार हो गए ॥
पार नहीं पड़ रही 'लोक' की
पर वे अपरम्पार हो गए ॥
मुल्क फँसा है मझधारों में
उनके बेड़े पार हो गए ॥
२७ जनवरी २००६
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पुस्तक - बेगाने मौसम
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