Wednesday, December 30, 2009

आपके बाप का है वतन, सेठजी


2009-12-13 


आपके बाप का है वतन, सेठजी ।
लूटो जितना तुम्हारा हो मन, सेठजी ।

लोग भूखे रहें, कोई मुद्दा नहीं
कर ही लेंगे ये सब कुछ सहन, सेठजी ।

कोई मूरत लगे या बने मकबरा
खर्च हम को ही करना वहन, सेठजी ।

घास हमको न डाले कोई पंच भी
आपके साथ सारा सदन, सेठजी ।

हमको दो गज़ ज़मीं भी नहीं मिल सकी
आपके पास धरती-गगन, सेठजी ।

ठाठ ही ठाठ हैं, आप करते हैं क्या
प्रश्न ये ही है सबसे गहन, सेठजी ।

१३-१२-२००९
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(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन ।
Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Joshi Kavi

Tuesday, December 8, 2009

चट्टानों से छन कर निकले

चट्टानों से छन कर निकले ।
तो जल गंगा बनकर निकले ।

जो थोड़ा सर ख़म कर निकले
वे दो अंगुल बढ़कर निकले ।

तलवारें तिरसूल गलें तो
फिर कोई हल ढलकर निकले ।

कर्मों पर विश्वास नहीं था
सो ज्यादा बन-ठन कर निकले ।

जो जितने ज्यादा ओछे थे
वे उतना ही तनकर निकले ।

वे माथे का तिलक बन गए
जो मिटटी में गलकर निकले ।

३ दिसंबर २००९
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