Tuesday, December 8, 2009

चट्टानों से छन कर निकले

चट्टानों से छन कर निकले ।
तो जल गंगा बनकर निकले ।

जो थोड़ा सर ख़म कर निकले
वे दो अंगुल बढ़कर निकले ।

तलवारें तिरसूल गलें तो
फिर कोई हल ढलकर निकले ।

कर्मों पर विश्वास नहीं था
सो ज्यादा बन-ठन कर निकले ।

जो जितने ज्यादा ओछे थे
वे उतना ही तनकर निकले ।

वे माथे का तिलक बन गए
जो मिटटी में गलकर निकले ।

३ दिसंबर २००९
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(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन ।
Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Joshi Kavi

Saturday, November 14, 2009

दस्ताने


जब दस्तानों से ही हाथ मिलाना है ।
तो फिर क्यों चलकर उनके घर जाना है ॥

अपनी आँखे बिछी रहेंगी रस्ते पर
वे अपनी जानें- आना, ना आना है ॥

कहीं पियो मन्दिर, मस्जिद, मैखाने में
नशा एक है जुदा-जुदा पैमाना है ॥

हमको सबका नशा अधूरा लगता है
सबने, सबको अलग-अलग पहचाना है ॥

चार धाम औ' हज़ सब कर आए लेकिन
जो घर में बैठा है वह अनजाना है ॥

३१-१०-२००९
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