चट्टानों से छन कर निकले ।
तो जल गंगा बनकर निकले ।
जो थोड़ा सर ख़म कर निकले
वे दो अंगुल बढ़कर निकले ।
तलवारें तिरसूल गलें तो
फिर कोई हल ढलकर निकले ।
कर्मों पर विश्वास नहीं था
सो ज्यादा बन-ठन कर निकले ।
जो जितने ज्यादा ओछे थे
वे उतना ही तनकर निकले ।
वे माथे का तिलक बन गए
जो मिटटी में गलकर निकले ।
३ दिसंबर २००९
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(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन ।
Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Joshi Kavi
Tuesday, December 8, 2009
Saturday, November 14, 2009
दस्ताने
जब दस्तानों से ही हाथ मिलाना है ।
तो फिर क्यों चलकर उनके घर जाना है ॥
अपनी आँखे बिछी रहेंगी रस्ते पर
वे अपनी जानें- आना, ना आना है ॥
कहीं पियो मन्दिर, मस्जिद, मैखाने में
नशा एक है जुदा-जुदा पैमाना है ॥
हमको सबका नशा अधूरा लगता है
सबने, सबको अलग-अलग पहचाना है ॥
चार धाम औ' हज़ सब कर आए लेकिन
जो घर में बैठा है वह अनजाना है ॥
३१-१०-२००९
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