Sunday, May 10, 2009
मेरा डर
उनका प्यार तसव्वुर निकला ।
कितना सच मेरा डर निकला ॥
किया जहाँ भी रैन बसेरा ।
बटमारों का ही घर निकला ॥
सबको साया देने वाला ।
आँचल आँसू से तर निकला ॥
सभी संगसारों की ज़द में
केवल मेरा ही सर निकला ॥
उनका ख़त बिन पढ़ा रह गया
सारा तंत्र निरक्षर निकला ॥
जीवन भर परबत खोदा पर
जब निकला चूहा भर निकला ॥
२३ मार्च २००५
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[ इतने दिनों तक पोस्ट न कर पाने के लिए मैं आप सबका क्षमार्थी हूँ, पिताजी ने एक बार कंप्यूटर जो सीखा, अब टाइप कर कर कतार लम्बी कर दी है, मैं ही पीछे रह गया हूँ पोस्ट कराने में - शशिकांत जोशी ]
(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन ।
(c) Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Joshi Kavi
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व्यंग्य
Monday, May 4, 2009
कभी प्यार से छुआ नहीं
लूट-मार, चोरी-डाका कुछ हुआ नहीं ।
फिर भी मेरे घर में कुछ भी बचा नहीं ॥
अपने दुःख की चीख-पुकारें करते सब
मगर पराया दर्द किसीने सुना नहीं ॥
फलवाली शाखाएँ झुक-झुक जाती हैं
बिन फलवाला पेड़ ज़रा भी झुका नहीं ॥
उन आमों में मीठा रस कैसे होगा
कभी जिन्होंने लू का झोंका सहा नहीं ॥
अपना घाव तभी तक गहरा लगता है
जब तक औरों के घावों का पता नहीं ॥
प्राण धड़कते हैं पत्थर के दिल में भी
मगर किसीने कभी प्यार से छुआ नहीं ॥
सबको अपनी रचना कालजयी लगती
किसी और का गीत किसी को जँचा नहीं ॥
१७ जनवरी २००९
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