Thursday, December 31, 2009

कुछ मत पूछो - कुण्डलियाँ


कुछ मत पूछो
आटा अम्बर में गया, दालें गई पताल ।
अपनी मानुस जूण का कुछ मत पूछो हाल ।
कुछ मत पूछो हाल, दिहाड़ी सारी खर्चे ।
फिर भी पूरा पेट नहीं भर पाते बच्चे ।
कह जोशीकविरय खाल सारी खिंच जाए ।
पर चूहे के चाम नगाड़ा ना बन पाये । ५-१२-२००९


नंगी का स्नान
होटल में मंत्री रुके दिन के बीस हज़ार ।
ऐसे तो मुश्किल पड़े इस भारत की पार ।
इस भारत की पार, पसीना लाख बहाए ।
तब भी संध्या तक दो सौ रुपये ना पाए ।
कह जोशीकविराय प्रणव दा पर ही छोंड़ें ।
जनता क्या स्नान करे, क्या वस्त्र निचोड़े । ५-१२-२००९

छोटी सी बात
पाँच सितारा में रुके जैसे गिर गई गाज़ ।
इक छोटी सी बात पर सब विपक्ष नाराज़ ।
सब विपक्ष नाराज़, हमारे ठाठ देखिये ।
करते सबकी सोलह दूनी आठ देखिये ।
कह जोशीकविराय आप बस पाँच सितारा ।
हम बिन छप्पर हैं सारा आकाश हमारा । ५-१२-२००९


सुरक्षा तंत्र
अमरीका को स्वयं पर है बहुत अभिमान ।
क्योंकि इकट्ठे कर रखे हैं सारे सामान ।
हैं सारे सामान, फिरे कर ऊँची कालर ।
जो भी चाहे करवा लेगा देकर डालर ।
कह जोशीकविराय हुआ क्या गज़ब इलाही ।
तोड़ सुरक्षा तंत्र भोज में घुसे 'सलाही' । ५-१२-२००९


भोजन की परवाज़
नब्बे रुपये दाल है चालीस रुपये प्याज ।
भूखे से ऊँची हुई भोजन की परवाज़ ।
भोज की परवाज़, उचक कर कूद लगाई ।
लगा न कुछ भी हाथ व्यर्थ ही टाँग तुड़ाई ।
कह जोशी कवि भूखे भजन न हो गोपाला ।
बोझा बन गई लोकतंत्र की कंठी-माला । ८-१२-२००९

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(c) सर्वाधिकार सुरक्षित - रमेश जोशी । प्रकाशित या प्रकाशनाधीन ।
Ramesh Joshi. All rights reserved. All material is either published or under publication. Joshi Kavi

2 comments:

परमजीत बाली said...

बहुत जोरदार कटाक्ष करती हुई सामयिक कुंडलियाँ है। बहुर बढ़िया लगी। धन्यवाद।

आपको व आपके परिवार को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं।

योगेश स्वप्न said...

jordaar/majedaar kundliyan.