Saturday, November 14, 2009

दस्ताने


जब दस्तानों से ही हाथ मिलाना है ।
तो फिर क्यों चलकर उनके घर जाना है ॥

अपनी आँखे बिछी रहेंगी रस्ते पर
वे अपनी जानें- आना, ना आना है ॥

कहीं पियो मन्दिर, मस्जिद, मैखाने में
नशा एक है जुदा-जुदा पैमाना है ॥

हमको सबका नशा अधूरा लगता है
सबने, सबको अलग-अलग पहचाना है ॥

चार धाम औ' हज़ सब कर आए लेकिन
जो घर में बैठा है वह अनजाना है ॥

३१-१०-२००९
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4 comments:

आशीष कुमार 'अंशु' said...

चार धाम औ' हज़ सब कर आए लेकिन
जो घर में बैठा है वह अनजाना है ॥
Bahoot khoob

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

कहीं पियो मन्दिर, मस्जिद, मैखाने में
नशा एक है जुदा-जुदा पैमाना है ॥

सही कह रहे हैं.

योगेश स्वप्न said...

JOSHI JI BAHUT DIN BAAD AAPKI EK AUR BEHATAREEN/ANUPAM RACHNA PADHNE KO MILI , KRAPYA REGULAR LIKHTE RAHEN. BADHAI SWEEKAREN.

Rajey Sha said...

चार धाम औ' हज़ सब कर आए लेकिन
जो घर में बैठा है वह अनजाना है ॥
और बड़ी मुश्‍ि‍कल है कि‍ ये खुद को जान जाये।